बिलासपुर

दंतेवाड़ा विकास मॉडल: संघर्ष से सृजन और ‘शैक्षणिक उत्कृष्टता’ की नई वैश्विक पहचान – डॉ. विजय साहू

दंतेवाड़ा विकास मॉडल: संघर्ष से सृजन और ‘शैक्षणिक उत्कृष्टता’ की नई वैश्विक पहचान – डॉ. विजय साहू

खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। आज जब मैं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शिक्षा और विकास पर चर्चा करता हूँ, तो अक्सर दंतेवाड़ा के नाम पर लोगों के जेहन में पुरानी स्मृतियाँ उभरती हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि दंतेवाड़ा अब ‘ शिक्षा आधारित समावेशी विकास’ का सफल वैश्विक केंद्र बन चुका है। यह बदलाव केवल बुनियादी ढांचे का नहीं, बल्कि जनमानस की सोच और संभावनाओं का है।

शैक्षणिक शिखर: निरंतरता और कीर्तिमान

दंतेवाड़ा की शैक्षणिक मजबूती का सबसे बड़ा प्रमाण यहाँ के निरंतर बेहतर होते परीक्षा परिणाम हैं। वर्ष 2025 में जिले ने कक्षा 10वीं में पूरे छत्तीसगढ़ राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त कर एक ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया। वहीं 12वीं में राज्य में छठा स्थान प्राप्त करना यह दर्शाता है कि यहाँ की शिक्षा व्यवस्था एक सही और वैज्ञानिक दिशा में अग्रसर है। वर्तमान सत्र में भी विद्यार्थियों और शिक्षकों का यही उत्साह दंतेवाड़ा को शीर्ष पर बनाए रखने के लिए संकल्पित है।

सामूहिक नेतृत्व और प्रशासनिक दूरदर्शिता

इस सफलता की नींव जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के विजन में है। कलेक्टर दंतेवाड़ा के मार्गदर्शन में शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। हाल ही में माननीय उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा जी द्वारा चितालंका स्थित ‘बाल मित्र पुस्तकालय एवं गतिविधि केंद्र’ का अवलोकन करना यह सिद्ध करता है कि शासन-प्रशासन स्वयं ज़मीनी स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता और ‘शाला त्यागी’ बच्चों को मुख्यधारा में जोड़ने हेतु गंभीर है।

नवाचार का केंद्र: डिजिटल और वैज्ञानिक क्रांति

दंतेवाड़ा ने आधुनिकता को अपनी शक्ति बनाया है:

जिला विज्ञान केंद्र

प्रधानमंत्री जी द्वारा ‘मन की बात’ में सराहा गया यह केंद्र आज छात्रों को 3D प्रिंटिंग और रोबोटिक्स से जोड़ रहा है। फरवरी 2026 की प्रदर्शनी में बच्चों के शोध मॉडल इसकी सफलता के प्रमाण हैं।

डिजिटल तारामंडल

कारली में स्थापित हो रहा प्रदेश का पहला डिजिटल प्लेनेटेरियम अंतरिक्ष विज्ञान की नई राह खोल रहा है।

समावेशी शिक्षा और ‘नन्हे परिंदों’ की नई उड़ान

जिले ने समाज के हर वर्ग के लिए विशेष शैक्षणिक मॉडल तैयार किए हैं:
आस्था, सक्षम और पोटा केबिन: ‘आस्था’ संघर्ष प्रभावित बच्चों को नया जीवन दे रहा है, ‘सक्षम’ दिव्यांग बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा का मानक है, और ‘पोटा केबिन’ ने सुदूर अंचलों में ‘ड्रॉप-आउट’ दर को न्यूनतम किया है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता

कौशल विकास की दिशा में ‘नन्हे परिंदे’ (पातररास) प्रशिक्षण केंद्र एक सशक्त मंच बनकर उभरा है। हाल ही में यहाँ के 20 विद्यार्थियों का चयन सैनिक स्कूल के लिए होना यह प्रमाणित करता है कि दंतेवाड़ा के बच्चे अब राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धाओं के लिए पूरी तरह तैयार हैं। ‘छू लो आसमान’ से NEET/JEE, ‘नवगुरुकुल’ से सॉफ्टवेयर कोडिंग और लाइवलीहुड कॉलेज के कौशल विकास कार्यक्रमों ने यहाँ के युवाओं के सपनों को वैश्विक विस्तार दिया है।

निष्कर्ष

दंतेवाड़ा का यह मॉडल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के लक्ष्यों—समानता, गुणवत्ता और अनुभवात्मक शिक्षण—को जमीन पर उतारने वाली एक जीवंत प्रयोगशाला है। 10वीं में राज्य में शीर्ष स्थान प्राप्त करने और सैनिक स्कूल ,NEET,JEE जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में बच्चों का चयन यह सिद्ध करता है कि यदि नीयत साफ हो, तो कलम की ताकत किसी भी चुनौती को अवसर में बदलकर नया इतिहास रच सकती है।

लेखक परिचय

डॉ. विजय साहू
(व्याख्याता एवं प्रभारी प्राचार्य, स्कूल शिक्षा विभाग, दंतेवाड़ा। विगत 8 वर्षों से शोध ,लेखन एवं शैक्षणिक नवाचारों में सक्रिय और समावेशी विकास के क्षेत्र में शोधरत।)

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