आज महिला दिवस पर भी महिलाओं का शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन! अब तो सुन लो सरकार?

खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। इन दिनों न्यायधानी बिलासपुर के ग्राम लिंगियाडीह के लोग जिन्होंने SECL और अपोलो अस्पताल को अपनी गाँव की गोद में स्थापित किया आज उन्हीं गरीब ग्रामवासियों को लिंगियाडीह से हटाया जा रहा है। लिंगियाडीह में निवासरत गरीब महिलाएँ और उनके परिवार को आज सड़क किनारे शांतिपूर्ण ढंग से धरना प्रदर्शन करनें मजबूर कर दिया गया है।

आंदोलन, धरना प्रदर्शन का आज महिला दिवस पर 108 दिन पूरा कर गया लेकिन इनकी समस्या का हल ढूंढने अब तक शासन प्रशासन द्वारा कोई प्रयास भी नहीं किया गया है।

108 वें दिन महिला दिवस के दिन भी लिंगियाडीह की महिलाओं नें अपना आंदोलन और धरना प्रदर्शन जारी रखा है। 108 दिन से घर(मकान नहीं) को टूटने से बचाने के लिए सड़क पर बैठ आंदोलन कर रही महिलाओं का प्रदर्शन, शासन, प्रशासन की अनदेखी और जनप्रतिनिधियों, समाज सेवकों, राजनीतिक दलों के नेताओं, सभी के समर्थन के बाद थमने का नाम नहीं ले रहा है।

यहाँ बैठी महिलाओं का प्रदर्शन समय की मार है वे सभी चुनौतियों का सामना कर रही हैं पाठकों की जानकारी के लिए बता दें कि बसंत विहार से महज 100 मीटर दूर धरना प्रदर्शन स्थल है जहाँ महीने में कम से कम एक बार तो प्रदेश मुख्यमंत्री अपने उड़न खटोला में न्यायधानी बिलासपुर आते हैं।

दूसरी ओर धरना स्थल से 500 मीटर दूर SECL के सहयोग से स्थापित भारत का प्रमुख अस्पताल अपोलो संचालित है यहाँ भी ईलाज हेतू बड़े बड़े नेता, मंत्री और रसूखदार लोगों आना जाना लगा होता है बावजूद इसके इन गरीब परिवार की आवाज राजधानी में बैठे छत्तीसगढ़ सरकार तक नहीं पहुँच पाना व्यवस्था की चूक है।

ये बेलतरा विधानसभा का चुनाव क्षेत्र भी है यहाँ के दमदार विधायक सुशांत शुक्ला हैं। लोगों ने उन्हें अपना विधायक चुना है। एक जन नेता लोकप्रिय विधायक का भी इस गंभीर मसले पर कोई पहल नहीं किया जाना एक बड़ा सवाल है! फिर भी बच्चों का भविष्य व चिंताजनक स्थिति का मुकाबला करते हुए महिलाओं का आंदोलन और धरना प्रदर्शन बदस्तूर 108 दिनों से जारी है।

यहाँ का नजारा बेहद दिलचस्प है हालात चुनौतियों भरा हुआ है बूढ़ी कांपते हाथों में तख्तियां मसीहा मददगार की उम्मीद पर टिकी हुई हैं। इनकी हथेली की टूटीफूटी रेखाएं कुछ कहें ना कहें लेकिन 108 दिन से उम्मीद का दीपक अपने जख्मी दिलों में जलाए बैठे हैं कि हमारा ये आंदोलन धरना प्रदर्शन हमारी सरकार के उस दरवाजे पर अखबारों, न्यूज़ चैनलों, वेब पोर्टल के माध्यमों से दस्तक है जो जनता के द्वारा चुनी गई है।

देशभर में आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और सशक्तिकरण के बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं, मंचों से महिलाओं के अधिकारों की बातें हो रही हैं, कार्यक्रमों में उनका विषय पर मान सम्मान और भाषणों की गूंज सुनाई दे रही है। लेकिन बिलासपुर के लिंगियाडीह में खुद के घरों को टूटने से बचाने बच्चों के भविष्य की चिंता से आंखों में चिंतन की हकीकत और माथे पे चिंता की लकीरें इन तमाम दावों को झुठलाती नजर आ रही है। यहां अपने घर और आशियाने को बचाने के लिए सैकड़ों गरीब महिलाएं पिछले 108 दिनों से लगातार धरने पर बैठी हुई हैं। अपने बच्चों और परिवार के साथ सड़क पर बैठकर वे न्याय की गुहार लगा रही हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने लंबे समय के बाद भी शासन-प्रशासन की ओर से कोई समाधान सामने नहीं आया है। धरने पर बैठी महिलाओं का कहना है कि वे मजबूरी में आंदोलन का रास्ता अपनाने को विवश हुई हैं। बीते तीन महीनों से अधिक समय से वे लगातार संघर्ष कर रही हैं। चाहे कड़ाके की ठंड हो, तेज धूप,और बेमौसम बरसात, कठिन परिस्थितियों के बावजूद वे अपने घर बचाने की लड़ाई से पीछे नहीं हटीं हैं।

उनका कहना है कि यह सिर्फ मकान का नहीं, बल्कि उनके बच्चों के भविष्य और उनके हक की लड़ाई है।

महिलाओं का आरोप है कि कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश में उनके दरवाजे पर दस्तक दी गई है, लेकिन गूंगी,बहरी और दृष्टिहीन शासन-प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को हमारी आवाज,हमारी समस्या अभी भी नही सुनाई दी है। विगत 108 दिनों में शासन-प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के पास हमसे मिलने का समय नही मिल रहा है ।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब महिला सम्मान और सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, तो 108 दिनों से सड़क पर बैठी इन महिलाओं की पीड़ा आखिर क्यों अनसुनी की जा रही है। धरने पर बैठी महिलाओं ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो वे अपने आंदोलन को और उग्र करने के लिए मजबूर होंगी। उनका कहना है कि जब तक उनके घर और आशियाने को सुरक्षित रखने की गारंटी नहीं मिलती, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।

एक मजबूत स्थानीय नेता कम, इनका बेटा, इनका लाल जो इनका सब कुछ है दुःख सुख का साथी, नाम है दिलीप पाटिल जिसका अर्थ राजा है वाकई में दिलीप पाटिल इन गरीबों का राजा है इसके सहारे यह लड़ाई मिल जुल कर लड़ी जा रही है।

धरनास्थल से आवाज: “हम अपने घर और बच्चों का भविष्य बचाने के लिए 108 दिनों से सड़क पर बैठे हैं। ठंड, धूप सब झेल ली, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई। अगर हमारी आवाज अब भी नहीं सुनी गई, तो आंदोलन और तेज होगा।”



