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RTI का जवाब नहीं देने एक से एक फंडा अपना रहे जनसूचना अधिकारी…?

खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। सबसे पहले तो इस कार्यालय के पटल (बोर्ड)को गौर से देखिए सूचना पटल से ये तो पता चल रहा है कि यह समग्र शिक्षा का शहरी स्रोत केंद्र बिल्हा का कार्यालय है लेकिन यह पता नहीं चल रहा है कि इतना महत्वपूर्ण कार्यालय कहाँ पर स्थित है, आप इस एड्रेस पर तो हरगिज यहाँ नहीं पहुँच सकते, शायद ढूंढते ही रह जाएंगे अब इतने महत्वपूर्ण कार्यालय का पता ही लापता हो तो!

अब या तो यहाँ पदस्थ प्रभावशाली अधिकारी उदासीन हैं या उच्च कार्यालय के अधिकारियों का दौरा या निरीक्षण नहीं होता, या उनकी मंशा कार्यालय तक आमजन को पहुचनें नहीं देना चाहते या फिर कोई और बात हो जो हमें भी पता ना हो!

दूसरी बात इस कार्यालय में सूचना का अधिकार का सूचना पटल (बोर्ड)नहीं लगा है क्यों नहीं लगा है यह तो यहाँ पदस्थ साहब से मुलाकात होने पर ही पता चल सकता है। अब तीन से चार बार जाने पर भी साहब से मुलाकात नहीं हो पाई, फोन लगाया तो साहब नें उठाया नहीं, ना ही पलट कर फोन लगाया जाहिर है ऐसे व्यस्त अधिकारी की नजर हो सकता है कभी बोर्ड पर ही नहीं गई हो तो पूछें किससे!

अब ले देकर खोजते-खुजाते पूछते -पुछाते हम इस कार्यालय की खोज कर लिए और सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सात अलग अलग आवेदन लगा कर जवाब का इंतजार कर रहे थे कि साहब के कार्यालय द्वारा भेजा गया ये पत्र जब हमारे घर के पते तक पहुँचा तो पत्र को पढ़कर हमारे होश उड़ गए।

लिखा था कि आपके द्वारा भेजे गए कुल 7 आवेदन पर कुल 5615 पेज की जानकारी है आप 2 रुपए प्रति पेज की दर से 11,230/रुपए कार्यालय में जमा कर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

ऐसा लगता है कि शहरी स्रोत समन्वयक सूचना के अधिकार कानून और धाराओं के विषय में ज्यादा कुछ जानते नहीं इसलिए ऐसा पत्र प्रेषित कर दिया नहीं तो कम से कम अपने उच्च अधिकारी को बता कर सलाह मशवरा के पश्चात ही कोई पत्र जारी करते।

हालांकि आवेदक नें साहब को एक आवेदन देकर निवेदन किया है कि नियमानुसार प्रति आवेदन के हिसाब से अलग अलग पत्र जारी कर पेज की जानकारी और राशि का ब्यौरा प्रदान करें और यदि नियम में अवलोकन का कोई प्रावधान हो तो अवलोकन हेतु पत्र लिखें।

तो देखा आपने कैसे एक शासकीय कार्यालय शहर के बीचों बीच होने के बाद भी सही एड्रेस के अभाव में गोपनीय तरीके से संचालित किया जा रहा है इससे पहले यहाँ एक सरकारी स्कूल बिना बच्चों के गुपचुप तरीके संचालित किया जा रहा था जरूरत है तनख्वाह खोर अधिकारियों को जागरूक होने की ताकि आम जनता की पहुँच कार्यालय और शासन की योजनाओं तक हो सके।

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