सिम्स बिलासपुर में बसंत पंचमी का भव्य आयोजन, अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने किया विद्या की देवी का आह्वान, ज्ञान और परंपरा के संगम से महका परिसर।

खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। न्यायधानी के प्रतिष्ठित छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (CIMS) में आज श्रद्धा, परंपरा और उत्साह का अनूठा संगम देखने को मिला। अवसर था ‘बसंत पंचमी’ के पावन पर्व का, जिसे सिम्स परिवार ने पूरी गरिमा और विधि-विधान के साथ मनाया। संस्थान के ऊर्जावान अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति के कर-कमलों से मां सरस्वती की पूजा-अर्चना संपन्न हुई। इस दौरान पूरा परिसर ‘या कुन्देन्दुतुषारहारधवला’ के मंत्रोच्चार से गुंजायमान रहा, जिससे वातावरण में एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ।
सांस्कृतिक विरासत और विधि-विधान
कार्यक्रम का शुभारंभ सुबह शुभ मुहूर्त में मां शारदे की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने मुख्य यजमान की भूमिका निभाते हुए पूर्ण वैदिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा संपन्न की। सिम्स परिसर में बने विशेष पंडाल को पीले फूलों और पारम्परिक सजावट से सुसज्जित किया गया था, जो वसंत ऋतु के आगमन का जीवंत अहसास करा रहा था। इस दौरान उपस्थित चिकित्सकों और छात्र-छात्राओं ने भी मां सरस्वती के चरणों में पुष्प अर्पित कर उज्जवल भविष्य और सद्बुद्धि की कामना की।
अधिष्ठाता का संबोधन: ज्ञान ही जीवन का आधार
पूजा के पश्चात उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने बसंत पंचमी के दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि “वसंत ऋतु प्रकृति के पुनर्जन्म का समय है। जिस तरह पतझड़ के बाद प्रकृति नई कोपलों के साथ खिल उठती है, उसी तरह मां सरस्वती की कृपा हमारे भीतर के अज्ञान को दूर कर नवीन विचारों का संचार करती है।”
डॉ. मूर्ति ने आगे कहा कि “विद्यार्थियों और चिकित्सकों के जीवन में मां सरस्वती का स्थान सर्वोपरि है। चिकित्सा क्षेत्र केवल विज्ञान नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण की कला है, जिसके लिए एकाग्रता और ज्ञान की अत्यंत आवश्यकता होती है। आज का दिन हमें यह याद दिलाता है कि हम निरंतर सीखने की प्रक्रिया में बने रहें। पीला रंग जो आज हम धारण करते हैं, वह सात्विकता, शुद्धता और सूर्य के प्रकाश का प्रतीक है, जो हमें नई ऊर्जा के साथ कार्य करने की प्रेरणा देता है।”
सिम्स परिवार की एकजुटता
इस गरिमामयी समारोह में सिम्स के वरिष्ठ चिकित्सकों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। डॉ. भूपेंद्र कश्यप, डॉ. एंटनी, डॉ. लखन सिंह, डॉ. जयपाल चंद्रवंशी और डॉ. कमलजीत जैसे दिग्गजों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर छात्रों का उत्साहवर्धन किया।

वरिष्ठ चिकित्सकों ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे शैक्षणिक संस्थानों में ऐसे आयोजनों से छात्रों के मानसिक और सांस्कृतिक विकास को बल मिलता है।
प्रशासनिक और सहायक स्टाफ की भूमिका भी इस आयोजन को सफल बनाने में सराहनीय रही। राका बेन, बाशन पंडित, रघुनंदन प्रसाद दुबे, दिनेश निर्मलकर, कमलेश दीवान, फेकू चंद्राकर, शत्रुघ्न वस्त्रकर, दिलीप यादव, इकबाल, राम कुसुम, और रंजू निर्मलकर सहित अन्य कर्मचारियों ने व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संभाला।
छात्रों में दिखा अभूतपूर्व उल्लास
समारोह का मुख्य केंद्र बिंदु सिम्स के भावी डॉक्टर यानी छात्र-छात्राएं रहे। बड़ी संख्या में छात्र पारम्परिक पीले वस्त्रों में नजर आए। छात्रों ने बताया कि मेडिकल की पढ़ाई के तनावपूर्ण माहौल के बीच ऐसे सांस्कृतिक आयोजन उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और एक नई ताजगी प्रदान करते हैं। पूजा के बाद छात्र-छात्राओं ने सामूहिक रूप से आरती की और एक-दूसरे को बसंत की बधाई दी।
प्रकृति और विजय का प्रतीक
कार्यक्रम के अंत में प्रसाद वितरण किया गया। चर्चा के दौरान यह बात उभर कर आई कि बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह अंधकार पर प्रकाश की विजय और कला, संगीत तथा विज्ञान के प्रति सम्मान व्यक्त करने का दिन है। डॉ. मूर्ति ने पतंगबाजी और लोक गीतों के माध्यम से प्रकृति के उत्सव को मनाने की परंपरा को भी रेखांकित किया।



