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कनिष्ठ को बचाने वरिष्ठ की चढ़ा दी बलि…युक्तियुक्तकरण में सत्य हो रहा पराजित और परेशान! साहब अब तो ले लो संज्ञान!

खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। शिक्षा के क्षेत्र के विद्वान कहते हैं कि युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया तो अंधा बांटे रेवड़ी चिन्ह चिन्ह कर दे जैसी होकर रह गई है जिसे देखो प्रमाण के साथ शिकायत कर रहा है लेकिन कोई भी जिम्मेदार अधिकारी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है।

कहते हैं कि युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया और जारी अतिशेष सूची में हुई लिपकीय त्रुटि,या कोई गुणा भाग,या फिर कोई अंदरूनी सेटिंग को लेकर शिक्षकों की शिकवा शिकायत और व्यवस्था को लेकर नाराजगी कम होने का नाम नहीं ले रही है ऊपर से गड़बड़ी सामने आने पर जिम्मेदार अधिकारी कुछ सुनने को भी तैयार नहीं है। वही 16 जून 2025 में शाला प्रवेश उत्सव के साथ स्कूल खुलने वाले हैं।

ऐसे ही एक मामले में हैरान, और मानसिक रूप से परेशान शिक्षक हरि कुमार पाण्डेय स०शि० (एल०बी०) शास० प्राथ० शाला नगोई, संकुल-बैमा, वि०ख०-बिल्हा, जिला-बिलासपुर (छ०ग०) में पदस्थ हैं का साफ तौर से कहना है कि कार्यालय जिला शिक्षाधिकारी बिलासपुर से युक्तियुक्त करण के तहत् मेरा नाम अतिशेष शिक्षक की सूची में आया है। जो कि मेरा वर्तमान शाला शास० प्राथ० शाला नगोई में कार्यभार ग्रहण दिनांक 23.10.2008 है एवं मेरे कनिष्ट राजेश कुमार गुप्ता स० शि० (एल०बी०) का शाला कार्य भार ग्रहण दिनांक 19.08.2009 है।

उनका आरोप है कि युक्तियुक्तकरण में वरीष्टता का ध्यान नही रखा गया तथा मेरा नाम अतिशेष शिक्षक की सूची में आया तथा मेरे से कनिष्ट शिक्षक राजेश कुमार गुप्ता को युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया से अलग रखा गया। क्यों?

साथ ही कार्यालय जिला शिक्षाधिकारी बिलासपुर द्वारा दावा आपत्ती का अवसर भी प्रदान नहीं किया गया। क्यों?

लचर व्यवस्था से परेशान शिक्षक नें सभी प्रमाण देते हुए कलेक्टर बिलासपुर से निवेदन किया है कि वरीष्टता को ध्यान में रखते हुए उचित कार्यवाही करनें का निवेदन किया है।

तो देखा आपने कि किस तरह आनन फानन में की गई युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया सारे शिक्षा जगत में हलचल मचा रही है कोई न्यायालय की शरण में है तो कोई संगठन की,किसी को शासन प्रशासन से उम्मीद है तो कुछ अभी जुगाड़ में लगे हैं कुल मिलाकर सभी परेशान हैं देखना होगा कि आखिरकार न्याय का ऊंठ किस करवट बैठता है!

युक्तियुक्तकरण के भवँर में गोते लगा रहे शिक्षकों का बेड़ा पार होगा या नहीं, ये तो पता नहीं,लेकिन इतना जरूर मालूम है कि यदि जल्द ही कोई निर्णय नहीं लिया जाता है तो शायद यह एक बड़े आंदोलन के रूप में सामने आए और जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही का खामियाजा शासन प्रशासन के साथ साथ स्कूलों में दर्ज और मर्ज का दंश झेल रहे बच्चों का भविष्य अंधकार में ना समा जाए!

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