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शिक्षाकर्मी वर्ग-3 से 2, और साला मैं तो “साहब” बन गया तक का सफरनामा! (01)

खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। वैसे तो हर किसी की इच्छा होती है कि वह पढ़ लिख कर साहब बने, कुछ लोग अपनी मेहनत और योग्यता से साहब बन भी जाते हैं लेकिन जो लोग मेहनत नहीं करते योग्य नहीं होते हैं तो साहब बन नहीं पाते, तो शिक्षा कर्मी वर्ग तीन में ले दे कर शिक्षक बन जाते हैं पर साहब बनने की इच्छा अंदर ही अंदर उमड़ती घुमड़ती रहती है, जुगाड़ लगाने की जुगत में जुड़ जाते हैं।

उन्हें रात के नींद नहीं आती, सुबह ले देकर स्कूल तो चले जाते हैं लेकिन वहाँ भी मुफ्त की तनख्वाह पाने की जुगत में बच्चों को पढ़ाते नहीं। जबकि बहुत से शिक्षा कर्मी वर्ग 3 में ही खुशी खुशी अपने साहब नहीं बनने की ख्वाहिश को पूरा करने, स्कूली बच्चों को साहब बनाने, एड़ी चोटी एक कर रहे हैं।

ये सरकारी शिक्षक महोदय जहाँ साहब बन कर बैठे हैं उस पद पर वरिष्ठ प्रधान पाठक को ही नियमानुसार बिठाया जाता है जबकि ये तो वरिष्ठ शिक्षक की श्रेणी में भी नहीं हैं।

प्रतिनियुक्ति का भरम और माया का मायाजाल साहब बनने का सपना, जुगाड़ प्रवित्ति के चलते पूरा हो तो जाता है लेकिन लोभ,भ्रष्टाचार और एकला चलो रे की प्रवृत्ति के चलते वापस विद्यालय आना जाना लगा रहता है। लेकिन यह भी सच कि शिक्षक को बच्चे पहचानते तक नहीं!

ये शिक्षा कर्मी शिक्षक(साहब) वर्ग 3 से दूसरे पायदान पर प्रमोशन से आ जरूर गए हैं लेकिन इनको प्रमोशन देने में (गोपनीय प्रतिवेदन) नियमों का पालन ही नहीं किया गया क्योंकि शिक्षा विभाग के जिम्मेदारों की आँखें, चांदी की चमक और गाँधी गड्डी से चौन्धिया गई थी,बस ले देकर बन गए शिक्षा कर्मी वर्ग 2।

इनके करीबी साथी कहते हैं ये रिश्वत के रास्ते में चलकर एक ऐसा सफर तय कर रहे हैं जिसकी कोई मंजिल नहीं! हाँ इतना जरूर है कि किसी भी स्कूली कार्यक्रम में मंच संचालन के लिए आगे आगे जरूर रहते हैं।

हम “समग्र” का अर्थ ढूंढ रहे थे शब्दकोश में बतलाया, आदि से अंत तक; समस्त; संपूर्ण समूचा; सारा; सब; सकल।

एक सवाल… युक्ति युक्त करण की प्रक्रिया के बाद क्या “साहब” को हटा कर वापस स्कूल भेजा जाएगा?

क्रमशः ………

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