बिलासपुर ग्रामीण कांग्रेस को चाहिए दमदार ‘फाइटर’: दिलीप पाटिल से बड़ा चेहरा कोई नहीं!
खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। आज जब कांग्रेस को ग्रामीण क्षेत्रों में सत्ता और संगठन के बीच की खाई पाटने वाले नेतृत्व की ज़रूरत है, तब एक मजबूत स्थानीय चेहरा, जो राजनीति में अर्पण, समर्पण औऱ तर्पण की भावना के साथ साथ जमीनी ताकत होने की छाप स्पष्टरूप से झलकता है वह सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि गरीबों का मसीहा है, गरीबों का आक्सीजन सिलेंडर कहा जाता है दिलीप पाटिल का नाम चारों ओर गूंज रहा है।
पाटिल का बायो-डाटा एक सामान्य राजनेता का नहीं, बल्कि एक जमीनी सिपाही, पढ़े-लिखे प्रशासक और वंचितों के लिए लड़ने वाले योद्धा का प्रमाण है। ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए उनकी दावेदारी महज़ एक पद की दौड़ नहीं, बल्कि बिलासपुर की ग्रामीण राजनीति में संघर्ष और योग्यता की निर्णायक ज़रूरत है।
क्यों दिलीप पाटिल ही सबसे बेहतर विकल्प हैं?
दिलीप पाटिल (जन्म: 16/03/1980) को चुनने का मतलब है कांग्रेस के तीन सबसे बड़े लक्ष्यों को साधना: शिक्षा, अनुभव और संघर्ष की वफ़ादारी।
1. शिक्षा की ताकत, कानूनी समझ का लाभ
दिलीप पाटिल केवल नारे लगाने वाले नेता नहीं बल्कि एक शिक्षित जननेता हैं। उन्होंने डी. फार्मा, एम.ए.और एल.एल.बी. की पढ़ाई पूरी की है।
मतलब क्या है?
इसका मतलब यह है कि वह अपने क्षेत्र की जनता के लिए केवल सड़क पर प्रदर्शन ही नहीं करते, बल्कि ग्रामीण और क्षेत्र की समस्याओं को कानूनी और प्रशासनिक तौर पर भी हल करने की क्षमता रखते हैं। अध्यक्ष के तौर पर, वह कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे, बल्कि सही कानूनी दिशा भी दिखाएंगे।
वह सीतादेवी हायर सेकेण्डरी स्कूल के संचालक हैं, जो उनकी संगठनात्मक और प्रशासनिक क्षमता का सबूत है।
2. राजनीति में लगातार 14 साल का ज़मीनी अनुभव, गाँव की रग-रग से वाकिफ़
ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष वह होना चाहिए जिसने मिट्टी में हाथ गंदा किया हो। दिलीप पाटिल ने 2005 से 2019 तक लगातार पंच और उपसरपंच के रूप में काम किया है।
मतलब क्या है? उन्हें पता है कि गाँव में सड़क, पानी, बिजली या राशनकार्ड की समस्या कागज़ पर नहीं, चौपाल पर कैसे सुलझाई जाती है। उन्होंने गांव की राजनीति को करीब से देखा समझा और हल किया है, न कि दूर से बैठकर निर्देश दिए हैं।
झुग्गी-झोपड़ी प्रकोष्ठ के ज़िला अध्यक्ष (2017 से) के तौर पर, वह गरीबों के सबसे बड़े हिमायती हैं, जो ग्रामीण और शहरी गरीब वोट बैंक के लिए निर्णायक है।
3. ‘फाइटर’ की पहचान: केवल पद नहीं, आंदोलन भी
दिलीप पाटिल का सबसे बड़ा ‘प्लस पॉइंट’ है उनका बेबाक और संघर्षशील जीवन।
सन् 1998 से अब तक उन्होंने कांग्रेस के हर छोटे-बड़े धरने और आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की है। वह ‘सीज़नल’ नेता नहीं, बल्कि ‘ऑल-वेदर’ कांग्रेस के कट्टर समर्थक और जमीनी कार्यकर्ता हैं।
जनता के लिए उन्होंने मूलभूत सुविधाओं को लेकर कलेक्टर और निगम का ना केवल घेराव किया है बल्कि न्याय भी दिलवाया है—यह साबित करता है कि वह अध्यक्ष बनने के बाद दफ़्तर में नहीं, बल्कि जनता के बीच मिलेंगे।
सन् 2001 में कलेक्टर द्वारा मिला सामाजिक कार्यकर्ता का पुरस्कार उनकी निःस्वार्थ सेवा का सरकारी प्रमाण है।
कांग्रेस के लिए यह एक रणनीतिक फैसला
दिलीप पाटिल का परिवार सन् 1987 से कांग्रेस की सेवा कर रहा है। उनकी निष्ठा पर सवाल उठाना बेमानी है। युवा ऊर्जा, उच्च शिक्षा और संघर्ष का इतना ठोस मेल किसी और दावेदार में मिलना मुश्किल है। बिलासपुर ग्रामीण क्षेत्र में कांग्रेस को अगर भाजपा से टक्कर लेनी है, तो उसे ऐसे नेता को आगे लाना होगा जो पढ़ा-लिखा भी हो और सड़क पर उतरना भी जानता हो।
कांग्रेस पार्टी के लिए समर्पित दिलीप पाटिल चरित्रवान योग्य उम्मीदवार है वे केवल एक अध्यक्ष पद के लिए नहीं लड़ रहे, वह बिलासपुर की ग्रामीण कांग्रेस में एक नया आयाम, भरोसेमंद परिणाम देने वालाऐतिहासिक बदलाव का युग लाने की तैयारी में हैं। कांग्रेस नेतृत्व को यह सुनहरा मौका दिलीप पाटिल देने से चूकना नहीं चाहिए।