बिलासपुर

युक्तियुक्तकरण का हाल बेहाल…अतिशेष का ख़ौफ, लूट गए शिक्षक, हो गए कंगाल…अधिकारी मा ला मा ल!

खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया शुरू होते ही अतिशेष की सूची में नाम आने से बचने के लिए ऊँचे असरदार और रसूखदार शिक्षकों के द्वारा अपनाए जा रहे तरीके (उपाय) एक के बाद एक सामने आने लगे हैं सेटिंग बाज शिक्षकों और अधिकारियों की पोल खुलने लगी है पहले राजधानी में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों नें चेतावनी दी कि किसी भी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा लेकिन शिकायत और दावा आपत्ति के बाद भी न्यायधानी के अधिकारी ना तो शिकायत सुन रहे हैं ना मानने को तैयार है।

सूत्रों के हवाले से युक्तियुक्तकरण मामले पर गड़बड़ी की एक और खबर निकल कर सामने आई कि संध्या नामक एक शिक्षिका जो कला संकाय की थीं उन्हें अंग्रेजी (विषय) विकल्प के तौर पर पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई थी लेकिन युक्तियुक्तकरण के दौरान उसे अंग्रेजी विषय का ही शिक्षक मानकर सबसे पहले उसी का काउंसिलिंग किया गया। इस दौरान जिम्मेदार अधिकारी जानबूझकर कर आँखे बंद किए हुए गांधारी और धृतराष्ट्र की भूमिका निभा रहे थे। मतलब साफ था कि शिक्षा के मंदिर के देवी देवता को अतिशेष सूची में नाम नहीं आने से बचाने का चढ़ावा चढ़ गया था।

सूत्रों के हवाले से एक खबर और निकल कर सामने आई कि एक गुप्ता सरनेम के उच्च श्रेणी शिक्षक, जिन्होंने दिव्यांग सर्टिफिकेट पर दिव्यांगता के प्रतिशत पर ओवर राइटिंग कर खुद को अतिशेष सूची में नाम आने से बचा लिया। सूत्र बताते हैं कि दिव्यांगता प्रमाण पत्र जो आज से लगभग 10-15 साल पहले बनवाया गया था जो स्कूल में जमा किया गया था। उस दौरान शंका होने पर कोई गुप्ता सरनेम की लेखपाल नें स्वयं ही प्रमाण पत्र की सत्यता पुष्टि करनें सिविल सर्जन कार्यालय गई थीं हालांकि अब वह लेखपाल रिटायर्ड हो चुकी है लेकिन उस दौरान उनकी इंक्वारी में मेडिकल बोर्ड नें भी इस दिव्यांग प्रमाण पत्र को ओवर राइटिंग वाला बतलाया था,इसलिए आज भी उन्हें ना ही दिव्यांग भत्ता मिलता है और ना ही इनकम टैक्स पर रिबेट लेकिन शिक्षा के सर्वोच्च मंदिर में बैठे देवी देवताओं को प्रसाद चढ़ाने पुजारी को माध्यम बनाया जाता है और युक्तियुक्तकरण हेतू जारी अतिशेष सूची से शिक्षकों नाम हटवाने का चढ़ावा चढ़ गया था इसलिए वह फ़र्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के आधार पर युक्तियुक्तकरण सूची से नाम हटवा चुके हैं। उन्हें विश्वास है कि जब पिछले 10-15 साल से सब कुछ ठीक ठाक है लेकिन शिक्षा विभाग में ऐसी भृष्ट और लचर व्यवस्था सिस्टम को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे हैं जबकि जिले के कलेक्टर नोडल अधिकारी हैं ऐसे में गड़बड़ी का सामने आना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता नजर आता है।

नियमतः हर तीन साल में अस्थायी दिव्यांगता प्रमाण पत्र का रिनिवल किया जाना चाहिए लेकिन जब जिम्मेदार ही नहीं मांगते तो झूठे दिव्यांगता का चोला ओढ़े शिक्षक अपनी नौकरी को दांव पर क्यों लगाएंगे!

दूसरी ओर जिम्मेदार प्राचार्य और कार्यालय लिपिक चीख चीख कर बता रहा है कि वह शिक्षक दिव्यांग नहीं है तो भी बीईओ मानने को तैयार नहीं है।

जानकर कहते हैं कि उनके मेडिकल सर्टिफिकेट में ओवरराइटिंग है,और जिसको मेडिकल बोर्ड के रजिस्टर से मिलान भी कराया गया है वहाँ उनका विकलांगता का प्रतिशत कुछ और था और प्रमाण पत्र पर कुछ और जिसकी फाइल स्कूल में रखी है। बावजूद इसके जिम्मेदारों कानों से सुनाई ना देना,आँखों से दिखलाई ना देना व्यवस्था पर सवाल और आगे चलकर बवाल खड़े करता नजर आता है।

कला संकाय की उमा अंग्रेजी पढ़ा रही है और अतिशेष सूची में नाम आने से खुद को बचाने के लिए शिक्षा के मंदिर में बैठे हाड़मांस के देवताओं को चढ़ावा चढ़ा रही है। शिक्षा विभाग में दलालों की भीड़ नजर आ रही है सौदे खुलेआम हो रहे हैं फिर भी प्रशासन मौन मूकदर्शक बना हुआ है और हकीकत की पाठशाला में सच्चाई का पाठ पढ़ाने वाले जिन शिक्षकों के साथ अन्याय हो रहा है वो किस देवता के मंदिर में मत्था टेकें?

अंत में बस इतना ही कि स्कूल शिक्षा विभाग के जिम्मेदार लाख कड़े निर्देश जारी कर दें लेकिन भृष्ट अधिकारी उसका अनुपालन करानें कतई गंभीर नजर नहीं आते।

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