बिलासपुर

माता का अनोखा मंदिर… जहाँ निःसंतान दंपती की खुशियों से भर जाती है झोली…।

खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। नव दुर्गा शक्ति पीठ, दुर्गा मंदिर, जरहाभाठा आस्था, इतिहास और परंपरा का संगम जरहाभाठा दुर्गा मंदिर आज़ादी की यादों से जुड़ा है जरहाभाठा का मंदिर चौक
बिलासपुर शहर के जरहाभाठा स्थित आदि शक्ति दुर्गा माता का मंदिर बरसों से भक्तों की आस्था का केंद्र है। माता के दरबार में अर्जी लगाने वाले संतान सुख से वंचित दंपती, असाध्य रोगों से पीड़ितजन की झोली माता खुशियों से भर देती है। नवरात्रि पर यहां माता के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ लगी रहती है। यहां विराजमान देवी की इतनी प्रसिद्धि इतनी है की इस पूरे क्षेत्र की पहचान मंदिर चौक से है।

नवरात्रि के साथ ही प्रमुख त्योहार, हिंदू पर्वों पर वर्षभर अनेक आयोजनों में हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।

देश की आजादी के दिन जयसिंह ठाकुर द्वारा लगाए पीपल के छांव तले बना शिवमंदिर और हनुमान जी का मंदिर चौक का इतिहास देश की आजादी के दिन से जुड़ा है। मंदिर समिति के संयोजक मंदिर के स्थापक आदरणीय श्री बृजभान सिंह ठाकुर बताते हैं कि 1947 में भारत आज़ाद हुआ तब आजादी का जश्न और आज़ादी की स्मृति के तौर पर एक पीपल का पौधा लगाया गया था। पीपल का पौधा धीरे-धीरे वृक्ष का रूप लेता गया।

यहां पहले 1961 में हनुमानजी की एक मूर्ति की स्थापना की गई। रायपुर-बिलासपुर मुख्यमार्ग के चौराहे पर स्थित छोटे मंदिर मे पीपल की छांव होने से यात्री भी रूककर सकून पाते थे। कुछ श्रद्धालु जो यहां नियमित दर्शन के लिए आते थे उनके मन में विचार आया कि यहां देवी की एक मूर्ति स्थापित की जाए। तत्कालिन वनपरिक्षेत्र अधिकारी श्री काले बंधु दुर्गामाता जी की मूर्ति मैं लाऊंगा एवं उनके द्वारा मां भवानी दुर्गा साक्षात मंदिर मे विराजमान है ।

इस तरह जरहाभाठा के ठाकुर समाज के लोगो के द्वारा आपसी सहयोग माता से एवं मोहल्ले के जन समुदाय के द्वारा शारिरीक एवं निःस्वार्थ रूप मे मंदिर के निर्माण कार्य मे जुझारूपन से एकत्रच हो कर मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

1984 में हुई देवी की प्राण-प्रतिष्ठा
स्थापना काल से मंदिर की सेवा में लगे समिति के पूर्व अध्यक्ष वर्तमान मे संरक्षक एवं मंदिर के निर्माणाधीन जजमान आदरणीय श्रदेय श्री बृजभान सिंठ ठाकुर ने बताया किं मंदिर बनाने के लिए आर्थिक सहयोग की जरूरत थी। बहुत दिन से मन मेें विचार चल रहा था। उन दिनों मेरे पास केवल पांच सौ रुपए थे। तभी माता मेरे स्वप्न मेें आई उन्होने कहा किस बात की देरी है। काम शुरू करो सब ठीक हो जाएगा। सुबह उठकर मैने माताजी के सपने में आने की चर्चा सहयोगियों से की। सब के सहयोग से माताजी का मंदिर तैयार हुआ। जयपुर से मूर्ति लेकर आने के बाद 9 अप्रैल 1984 को माता की मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हुई। ओंकार प्रसाद साधवानी के सहयोग से 29 अप्रैल 1984 को शिव परिवार की स्थापना से मंदिर में रौनक और बढ़ गई. धीरे-धीरे इस मंदिर की ख्याति शहर सहित आसपास में बढ़ने लगी।

वैष्णोदेवी धाम से जुड़ी आस्था
मंदिर समिति से जुड़े कोषाध्यक्ष ईश्वर पाण्डेय ने बताया कि जनसहयोग से मंदिर का विस्तार होता गया। 1995 मंदिर समिति से जुड़े 8 लोग बृजभान सिंह ठाकुर शैलेन्द्र सिंह ठाकुर लोकनाथ कौशिक अंजोरी दास अजय पाल मजीद मामु और दो अन्य मां भवानी वैष्णव देवी धाम दर्शन के लिए गए थे।

वहां से अखण्ड ज्योत प्रज्ज्वलित कर शहर लाया गया। दुर्गा मंदिर में अखंड ज्योत की स्थापना 1997 में की गई जो आज तक प्रज्जवलित है। श्रद्धालु ज्योत के दर्शन कर ज्योत के माध्यम से अपनी अर्जी मां वैष्णोदवी के चरणों में लगाते हैं एवं पर्व के
त्योहार पर विशेष आयोजन
दुर्गा मंदिर के सभी प्रमुख पर्व पर जैसे गणेश चतुर्थी, हरितालिका तीज, हलषष्ठी व्रत और दशहरा पर्व के अवसर पर उत्सव को बडे धूमधाम से मनाया जाता है। पं. ईश्वर प्रसाद पाण्डेय के मार्गदर्शन में यहां नवरात्र के दोनों प्रमुख पर्व में श्रद्धालु दर्शन व पूजन के लिए जुटते है मंदिर मे शहर सहित दूर-दूर से भी श्रद्धालु माता के दरबार में ज्योति कलश प्रज्जवलित करा कर अपनी मनोकामना हेतु ज्योत प्रज्ज्वलित कराते हैं। श्रद्धायालुगण अपने शुभ कार्यों की शुरुआत भी नवरात्रि पर्व पर कन्या भोज का आयोजन कराते हैं। भव्य रूप से यहां कन्या भोज होता है जिसमें सैकड़ों कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर पूजा की जाती है तथा उनको श्रद्धा पूर्वक भोजन कराया जाता है।क्वांर व चैत्र दोनों प्रमुख पर्व मे नवमी तिथि को सामूहिक कन्या पूजन दर्शनीय रहता है जिसमें कई श्रद्धालु माता से आशीर्वाद प्राप्त करने अपनी सहभागिता दर्ज कराते हैं।

उपरोक्त जानकारी आयोजक दुर्गा मंदिर समिति द्वारा साझा किया गया।

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