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न्यायधानी में सुलगते सवाल, क्यों मचा है शिक्षा विभाग में बवाल!

खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। इन दिनों न्यायधानी बिलासपुर का शिक्षा विभाग और उसका दागदार दामन संजोए अधिकारी,कर्मचारी और शिक्षक दलाल, पैसे के बल पर या यूँ कहें रिश्वत के दम पर या यह भी कह सकते हैं कि दस टका कमीशन के दम पर बिना शर्मिंदगी महसूस किए नियम कानून को बदलने की कोशिश में लगे हैं। नियमों की अनदेखी से आदेश जारी करनें वाले बेलगाम अधिकारी द्वारा “नजीर” पेश किया जा रहा है, भ्र्ष्टाचार के आरोपों से घिरे निलंबित बाबू का बहाली आदेश, उसका जीता जागता उदाहरण है। शिक्षा विभाग में बुद्धिजीवियों के अनसुलझे सवालों का समुंदर हिलोरें मार रहा है। जवाब नदारद था,नदारद है,नदारद रहेगा! हालात देख कर कहा जा सकता है कि यदि न्यायधानी में भृष्टाचार का ऐसा उदाहरण सामने आ रहा है तो प्रदेश के तमाम जिलों के हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है।

बिटिया की मौत… पर सवाल!

हाल ही में शिक्षा जगत से जुड़ी एक नाबालिग बिटिया नें फाँसी लगाकर अपने ही घर पर आत्महत्या करने जैसा कदम उठाया और अपनी जान दे दी। माता पिता बिलखते रहे,समाज सोचने लगा कि आखिर वजह क्या थी। आंदोलन हुआ, पुलिस नें भी जाँच की, शिक्षा विभाग ने भी तीन सदस्यीय टीम बनाई गई।

शिक्षा विभाग का वह स्लोगन “बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ”, सिर्फ़ दीवारों पर दिखलाई देता है, हकीकत तो, मौत पर रिश्वत की बोली लगाई जाती है साहब, सौदा सिर्फ दोषियों को बचाए जानें का होता है, अब न्यायधानी में नियम कानून को तोड़ा और मरोड़ा जाता है, सवालों का गुच्छा शिक्षा जगत से होते हुए घटना से जुड़े तमाम सफेदपोश लोग,रसूखदार बेईमान लोग के आगे नतमस्तक होती शिक्षा व्यवस्था इस घटना का ज्वलंत उदाहरण है!

आज दिनाँक तक जाँच की रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी तक पेश नहीं किया गया है बस तारीख पर तारीख दी जा रही है मानों सवालों से सुलगती चिता के बुझने का इंतजार किया जा रहा हो! लेकिन मुखबिर कहता है कि जाँच रिपोर्ट तो बन गई है निष्पक्षता का ध्यान रखा गया है न्यायधानी में न्याय होगा, न्याय मिलेगा?

गवाह बनी सरकारी स्कूल की खिड़की…

हाल ही में हुए तीन तीन शिक्षकों का सस्पेंशन पर निकल कर आया कि सरकारी स्कूल की खिड़की से स्कूल में अध्ययनरत बच्चों नें देखा कि उन्हें सत्य की राह दिखलाने वाला शिक्षक स्वयं मदिरापान और मांस खा रहा है। मुँह में गुटखा चबा रहा है शराब के नशे में गंदी गंदी गालियाँ बक रहा है और जब तक आंखों से आँसू बहकर गाल पर झलक ना जाएं तब तक बच्चों को पीट रहा है। अगर न्यायधानी में ऐसा हो सकता है तो साहब प्रदेश के अन्य जिलों के हालात,साहब व्यवस्था में ही दोष है!

सिस्टम का फेमस डायलॉग…

मंत्री क्या, सिस्टम में आने के बाद सिस्टम का भार अपने कांधे पर उठाए लोगों का फेमस डायलॉग है,सभी से यही सुना है और सदियों से सुनते आ रहे हैं कि विभाग में भर्ष्टाचार और लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी, जिम्मेदार पर होगी कार्यवाही! ये वही मंत्री,अफसर और कर्मचारी हैं जो ईमानदारी की शपथ लेते हैं और कमीशन के नाम पर कुछ भी करनें को तैयार हैं, सिस्टम वालों,लोग भले ही खुलकर सामने ना हंसे,पर पूरी जनता को ये पता होता है कि आप दरअसल पहले क्या थे और अब क्या हैं! क्योंकि आपको चुना हमनें है!

चढ़ावा की पोस्टिंग… दामन दागदार!

चढ़ावा(पैसा), हर दाग को छुपा देता है जैसे बीयूटीपार्लर लेकिन,दामन फिर भी दागदार होता है यदि न्यायधानी के नाम से मशहूर शहर के शिक्षा विभाग में ऐसा है तो आप समझ सकते हैं कि सरकारी शिक्षा विभाग और शिक्षा का मंदिर अंदर से कितना खोखला होगा,बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता का स्टैंडर्ड कैसा होगा! सही मायने में ये शिक्षा विभाग के दुश्मन हैं अगर न्यायधानी में ऐसा हो रहा है तो आप प्रदेश के हालात से वाकिफ़ हों ना हों अंदाजा जरूर लगा सकते हैं!

चढ़ावे की पोस्टिंग…DE का तनाव

साहब, दागदार दामन के साथ और चढ़ावा चढ़ाने के बाद,बेशर्मी का चश्मा पहनकर कुर्सी पर बैठ तो गए हैं, योग्यता हो ना हो फैसला लिया जा रहा है पूरी हो चुकी जाँच को प्रक्रियाधीन बताया जा रहा है कहीं गुपचुप तरीके से लिए गए फैसले का पुरजोर विरोध किया जा रहा है राजधानी में अधिकारी बुलाकर फटकार लगा रहे हैं फिर भी चढ़ावे की सरकार चल रही है।

आस्तीन के सांप

कहते हैं सँवरा लोग अब साँप पकड़ना बंद कर दिए हैं लेकिन नए नए बने अधिकारी के आस्तीन में सांप की विभिन्न प्रजातियों को उनके आस्तीन के भीतर,उनके इर्द गिर्द कुलबुलाते देखा गया है,वो भी सोच रहे हैं कि “साला मैं तो साहब बन गया” लेकिन दामन में लगे दाग तब तक साफ नहीं होंगे, जब तक दाग लगाने वाला लिख कर ना दे दे कि मैं जाँच से संतुष्ट हूँ, मुझे न्याय मिल गया… लेकिन घर तक सिफारिशों का दबावी घोडा, दौड़ाने के बाद भी सामने वाला लिखने को तैयार नहीं है, उनसे कहता है पहले कहाँ थे, तब क्यों नहीं आए जब मुझ पर दुःखो का पहाड़ टूटा था…! जैसा किए हो, भोगो! अब अगर गुनाहों के कबूलनामे पर DE बैठ गई तो, सच तो बाहर आएगा ही! वैसे ही जैसे डूबते जहाज से चूहे।

मेडिकल बिल फर्जीवाड़े पर…FIR!

साहब, जब काम के एवज में अच्छी खासी तनख्वाह मिलती है तो सरकारी खजाने को लूटना क्यों जरूरी है। रिश्वत का खून मुँह में लग गया है फ़र्जी मेडिकल बिल, रिश्वत की आड़ में पास किया जा रहा था और सरकारी खजाने को पहले भी चूना लगाया जा रहा था, कि शिकायत हुई और फिर जाँच,तो भांडा फूटा तो दो सस्पेंड कर दिए गए और अन्य पर..अब FIR तो होगी, कब होगी, होगी कि नहीं, इसी सवाल पर जनता मूकदर्शक बनी खड़ी है इंतजार में दिन गिनते महीने कट रहे हैं! लेकिन थाने की चौखट पर बुलावे की दस्तक आरोपितों को सुनाई नहीं दी है ना ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर कुछ लिखा पढ़ा गया है। हाँ इतना जरूर है कि आरोपितों पर अपराध दर्ज और आरोपित सब कुछ मैनेज कर लिए जाने का ढिढोरा पीटते नजर जरूर आते हैं तब सरकार की क्षवि और शिक्षा संहिता पर सवाल और बवाल खड़े होता नजर आता है?

सीसीटीवी कैमरा का रहस्य उजागर!

आपने सुना होगा, देखा भी होगा कि सरकारी पैसों से दफ्तर में सीसीटीवी कैमरा लगाया जाता है लगाने के बहुत से कारण होते हैं लेकिन एक अधिकारी ने अपनी तनख्वाह से सीसीटीवी कैमरा लगवाया, पता नहीं किस की नजर लग गई और किस पर नजर रखी जा रही थी लेकिन अधिकारी के बदलते ही दूसरे अधिकारी ने निकलवा दिया। अब लोग पुछ रहे हैं कि सीसीटीवी कैमरा लगवाया क्यों गया था? किस पर नजर रखी जा रही थी?

अंत में बस इतना ही कि निपट नौसिखिए चमचों से घिरा हुआ अहंकारी, बड़ा विषैला होता है।

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