दागदारों को ताजपोशी, ईमानदारों को वनवास – स्कूल शिक्षा विभाग में कुंडली देखे बिना बांटे जा रहे हैं DEO-BEO और JD के ताज। (पढ़िए एक व्यंग)

रिपोर्ट कार्ड देखे बिना आदेश जारी, फिर जब खबर और कोर्ट फटकारे तब सरकार को होश आए – यही है नया सुशासन?
खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में इन दिनों एक नई परंपरा चल पड़ी है – पहले नियुक्ति, फिर जांच।

कौन अधिकारी कितना दागदार है, किस पर कितने लाख के गबन का आरोप है, कौन निलंबित रह चुका है, किसकी विभागीय जांच पेंडिंग है, किसकी पेंशन से वसूली की सिफारिश हो चुकी है… ये सब देखने की फुर्सत किसे है? साहब को तो बस कुर्सी भरनी है।

आदेश निकलता है, जॉइनिंग पर फूल-माला पहनाई जाती है, और जिले का सबसे बड़ा शैक्षणिक पद एक ऐसे हाथ में सौंप दिया जाता है, जिसका रिपोर्ट कार्ड खुद ही फेल है।
फिर क्या होता है?
फिर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अपनी कलम उठानी पड़ती है। खबर को लिखना पड़ता है – लाखों के घोटाले में वसूली की सिफारिश, शासन ने उन्हें ही बना दिया DEO”।

फिर किसी जागरूक नागरिक को जनहित याचिका लेकर न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है। कोर्ट पूछता है – “ये नियुक्ति किस आधार पर की?” तब जाकर विभाग फाइलें खंगालता है।
सवाल बड़ा है –
क्या स्कूल शिक्षा विभाग में अब BEO, DEO, JD जैसे पद ईनाम बन गए हैं? क्या भ्रष्टाचार की सजा अब प्रमोशन है?

जिस शिक्षक को 10 मिनट लेट आने पर नोटिस मिल जाता है, उस विभाग का मुखिया अगर खुद दागदार होगा तो वह क्या अनुशासन सिखाएगा? जिस अधिकारी पर खुद घोटाले का दाग है, वह दूसरे शिक्षकों की ईमानदारी कैसे तय करेगा?

सरकार को समझना होगा, कुर्सी केवल कुर्सी नहीं होती, वह लाखों बच्चों के भविष्य की कुंडली होती है। बिना रिपोर्ट कार्ड देखे, बिना सेवा पुस्तिका पलटे, केवल चाटुकारिता और जुगाड़ के दम पर बांटे गए ये पद, पूरे सिस्टम को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं।
अब तो आलम ये है कि नियुक्ति आदेश को ही सबसे बड़ा क्लीन चिट मान लिया गया है।





