एक तरफ जिला में शाला प्रवेश उत्सव का त्यौहार बच्चों के ललाट पर तिलक लगाकर मनाया जा रहा है दूसरी ओर स्कूली बच्चों का एक बड़ा दल अपने गाँव के स्कूल से निकल “कलेक्टर” के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है मनुहार लगा रहा है कि “साहब स्कूल में शिक्षक” ही नहीं है,पढ़ाने लिखाने शिक्षक ही दे दो…! सवाल यह कि कब तक छिपाएंगे सरकारी स्कूलों में बदहाल व्यवस्था? डीईओ बदल गए व्यवस्था नहीं बदली!

खबर खास छत्तीसगढ़ बिलासपुर। वैसे तो बुद्धिजीवियों ने बिलासपुर को न्यायधानी कहा है दूसरी ओर एजुकेशन हब भी पुकारते हैं वैसे ही कहते हैं कि स्कूल शिक्षा का मंदिर होता है और इस वर्ष भीषण गर्मी के बावजूद शिक्षा के मंदिर के पट 16 जून से नौनिहालों के शाला प्रवेश के लिए खुल गए हैं सभी जानते हैं कि इस साल मानसून समय पर नहीं आया, इसलिए सूरज की तपिश बरकरार है। यही कारण है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति कम है फिर भी जो बच्चे आ रहे हैं, उनका तिलक लगाकर स्वागत किया जा रहा है भले ही स्कूल में शिक्षक हो ना हों,किताबें आयी हो, ना हो, गणवेश वितरण किया गया हो, ना हो लेकिन शाला प्रवेश उत्सव मनाया जा रहा है सच यह भी है कि शाला प्रवेश उत्सव अब यह हर साल की परंपरा बन गई है।

जुलाई महीने के अंत तक यह उत्सव चलता रहेगा। इस उत्सव में हिस्सा लेने नेता, मंत्री और अफसर आ रहे हैं और आएंगे। बच्चों को तिलक लगाएंगे पुस्तक वितरण किया जाएगा,गणवेश दिया जाएगा। कुछ जगहों पर बच्चों का मुंह मीठा कराया जाएगा। माननीय अतिथि महोदय आँखों पर गांधारी की तरह पट्टी बांध, शिक्षा पर ज्ञान बाँटेंगे जैसे उन्हें स्कूल अव्यवस्था पर कुछ दिखलाई ही नहीं दे रहा हो और हो गया शाला प्रवेश उत्सव…।
उत्सव के माहौल में मंच से घोषणा कर,कुछ बातें नेता, मंत्री और अफसर हर बार की तरह इस बार भी भूल जाएंगे। जैसे, हमारे जिले में कितने स्कूलों के भवन जर्जर हैं,कितने स्कूल में टॉयलेट नहीं हैं स्कूल की छतों से पानी टपकता है। बारिश के दौरान कई स्कूल ऐसे भी हैं, जहां पानी भरने के कारण छुट्टी दे दी जाती है। युक्तियुक्तकरण के नाम पर जिन शिक्षकों को एकल या गैर शिक्षकीय स्कूलों में भेजा गया था, वे फिर ‘जुगाड़’ लगाकर शहर या आसपास लौट आए हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह होती है कि शिक्षा का प्रकाश फैलाने का भाषण देने वाले जिम्मेदारों की आंखों में महाभारत के गांधारी की तरह आँखे होते हुए भी अंधत्व छा जाता है और उन्हें ये समस्याएं नहीं दिखतीं। आख़िर शासन प्रशासन के जिम्मेदार इन समस्याओं को लेकर अंधे बहरे और गूंगे कैसे हो सकते हैं?
आप सोचिए कि जिस तरह स्कूल शिक्षा का मंदिर होता है ठीक उसी तरह बच्चे देश का भविष्य होते हैं शिक्षा देकर ही शिक्षक बच्चों का भविष्य संवरेगा लेकिन जब स्कूल में शिक्षक ही नहीं होंगे तो भला देश की बुनियाद मजबूत कैसे होगी… जैसे भाषण देने वाले हमारे जिम्मेदार, बच्चों को किस हाल में शिक्षा दे रहे हैं, क्या इन हालातों में ये देश का नाम रौशन करेंगे? क्या जिम्मेदारों को सालों से ढोई जा रही शिक्षा से जुड़ी समस्याओं पर लिखने, बोलने, बतलाने के बाद भी शर्म नहीं आती। यदि आती है तो समस्याओं को दूर करके दिखाना चाहिए कि स्कूल जर्जर नहीं होंगे, टॉयलेट साफ़ सुथरे होंगे, किताबें समय पर मिलेंगी और सबसे जरूरी, पढ़ाने के लिए स्कूल में शिक्षक भी होंगे, जो नियमित स्कूल आएंगे और बच्चों को पढ़ायेंगे। सरकारी स्कूल सिर्फ निःशुल्क शिक्षा, निःशुल्क गणवेश, निःशुल्क किताबें, व मध्याह्न भोजन का केंद्र नहीं रहेगा।





